श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय अठारहवाँ अध्याय अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! सविता की पत्नी पृश्नि के गर्भ से आठ सन्तानें हुई — सावित्री, व्याहृति, त्रयी, अग्निहोत्र, पशु, सोम, चातुर्मास्य… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १७ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सत्रहवाँ अध्याय चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! विद्याधर चित्रकेतु, जिस दिशा में भगवान् सङ्कर्षण अन्तर्धान हुए थे, उसे नमस्कार करके आकाशमार्ग से स्वच्छन्द विचरने लगे ॥ १ ॥ महायोगी चित्रकेतु करोड़ों वर्षों… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १६ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सोलहवाँ अध्याय चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! तदनन्तर देवर्षि नारद ने मृत राजकुमार के जीवात्मा को शोकाकुल स्वजनों के सामने प्रत्यक्ष बुलाकर कहा ॥ १ ॥ देवर्षि नारद ने कहा… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पंद्रहवाँ अध्याय चित्रकेतु को अङ्गिरा और नारदजी का उपदेश श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! राजा चित्रकेतु शोकग्रस्त होकर मुर्दे के समान अपने मृत पुत्र के पास ही पड़े हुए थे । अब महर्षि अङ्गिरा और देवर्षि नारद… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १४ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चौदहवाँ अध्याय वृत्रासुर का पूर्वचरित्र राजा परीक्षित् ने कहा — भगवन् ! वृत्रासुर का स्वभाव तो बड़ा रजोगुण-तमोगुणी था । वह देवताओं को कष्ट पहुँचाकर पाप भी करता ही था । ऐसी स्थिति में भगवान् नारायण के चरणों… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तेरहवाँ अध्याय इन्द्र पर ब्रह्महत्या का आक्रमण श्रीशुकदेवजी कहते हैं — महादानी परीक्षित् ! वृत्रासुर की मृत्यु से इन्द्र के अतिरिक्त तीनों लोक और लोकपाल तत्क्षण परम प्रसन्न हो गये । उनका भय, उनकी चिन्ता जाती रही ॥… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १२ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय बारहवाँ अध्याय वृत्रासुर का वध श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! वृत्रासुर रणभूमि में अपना शरीर छोड़ना चाहता था, क्योंकि उसके विचार से इन्द्र पर विजय प्राप्त करके स्वर्ग पाने की अपेक्षा मरकर भगवान् को प्राप्त करना श्रेष्ठ… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय ११ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ग्यारहवाँ अध्याय वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! असुरसेना भयभीत होकर भाग रही थी । उसके सैनिक इतने अचेत हो रहे थे कि उन्होंने अपने स्वामी के धर्मानुकूल वचनों पर भी ध्यान न… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १० ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दसवाँ अध्याय देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! विश्व के जीवनदाता श्रीहरि इन्द्र को इस प्रकार आदेश देकर देवताओं के सामने वहीं-के-वहीं अन्तर्धान हो… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय ९ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नवाँ अध्याय विश्वरूप का वध, वृत्रासुर द्वारा देवताओं की हार और भगवान् की प्रेरणा से देवताओं का दधीचि ऋषि के पास जाना श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! हमने सुना हैं कि विश्वरूप के तीन सिर थे ।… Read More