श्रीरुद्र गीता श्रीरुद्र गीता ।। चौपाई ।। सुनु मुनि यह तन – मन्दिर माहीं । दुइ विधी चेतन-रुप सदा ही ।। निर्विकल्प आतम यक रुपा । सदा एक – रस शान्त अनूपा ।। यक चैतन्योन्मुख वपु अहई । सो वह मिला दृश्य सन रहई ।। वास्तव मँह न भयो कछु कैसे । स्वप्न -सृष्टि पुनि जाग्रत जैसे… Read More
श्री तारा वन्दना श्री तारा वन्दना ॐ श्री तारायै नमः जटा पिंगला बद्ध-नागाधिराजा, प्रभा स्वर्ण-बालार्क-बाला हिरण्या । प्रतीची दिशा मेरु-रा तरण्या ।। नदी चोलना पावना कल्पना में, कली प्रस्फुटी पद्म वादी नदी में, जगी प्रात-काले प्रभा सूर्य-कन्या ।। दया-सागरा उग्र-ताश्वेता सु-रम्या । विराजें उसी पुष्प पे उग्र-तारा, करे कर्त्तरी खड्ग वामे सु-धन्या ।। दया-सागरा उग्र-तारा तरण्या ।।… Read More
सीता, राम ही की थाती है सीता, राम ही की थाती है बोले वशिष्ठ, सुनिये मान्यवर विदेहराज, याचक प्रतीक्षा करैं, कहाँ मेरे दानी हैं । सुतन समेत ठाढ़े द्वारे दशरथ आज, कैसे विलम्ब होत, अँखियाँ टकटकानी हैं ।।… Read More