ब्रह्मवैवर्तपुराण – प्रकृतिखण्ड – अध्याय 40 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ चालीसवाँ अध्याय भगवती स्वाहा का उपाख्यान, उनके ध्यान,  पूजा-विधान तथा स्तोत्र का वर्णन नारदजी ने कहा — प्रभो ! मुनिवर नारायण ! आप रूप, गुण, यश, तेज एवं कान्ति में साक्षात् भगवान् नारायण के ही समान हैं । मुने!… Read More


ब्रह्मवैवर्तपुराण – प्रकृतिखण्ड – अध्याय 39 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ उनतालीसवाँ अध्याय इन्द्र के द्वारा महालक्ष्मी के ध्यान तथा स्तवन किये जाने और पुनः अधिकार प्राप्त किये जाने का वर्णन नारदजी ने कहा — प्रभो ! मैं भगवान् श्रीहरि का मङ्गलमय गुणानुवर्णन, उत्तम ज्ञान तथा भगवती लक्ष्मी का अभीष्ट… Read More


ब्रह्मवैवर्तपुराण – प्रकृतिखण्ड – अध्याय 38 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ अड़तीसवाँ अध्याय भगवती लक्ष्मी का समुद्र से प्रकट होना भगवान् नारायण कहते हैं — नारद! तदनन्तर भगवान् श्रीहरि का ध्यान करके देवराज इन्द्र ने बृहस्पतिजी को आगे करके सम्पूर्ण देवताओं के साथ ब्रह्मा की सभा के लिये प्रस्थान किया।… Read More


ब्रह्मवैवर्तपुराण – प्रकृतिखण्ड – अध्याय 37 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ सैंतीसवाँ अध्याय महालक्ष्मी के देवलोक-त्याग और इन्द्र के दुःखी होकर बृहस्पति के पास जाने का वर्णन नारदजी ने पूछा —भगवान् श्रीहरि का गुणगान सुनकर इन्द्र को जब ज्ञान प्राप्त हो गया, तब उन्होंने घर जाकर क्या किया ? यह… Read More


ब्रह्मवैवर्तपुराण – प्रकृतिखण्ड – अध्याय 36 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ छत्तीसवाँ अध्याय इन्द्र को दुर्वासा के शाप का वर्णन नारदजी ने पूछा — भगवन् ! श्रीमहालक्ष्मी भगवान् नारायण की प्रिया होकर सदा वैकुण्ठ में विराजती हैं। उन सनातनीदेवी को वैकुण्ठ की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। फिर वे देवी… Read More


ब्रह्मवैवर्तपुराण – प्रकृतिखण्ड – अध्याय 35 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ पैंतीसवाँ अध्याय भगवती महालक्ष्मी के प्राकट्य तथा विभिन्न व्यक्तियों से उनके पूजित होने का वर्णन नारदजी ने कहा — भगवन्! मैं धर्मराज और सावित्री के संवाद में निर्गुण-निराकार परमात्मा श्रीकृष्ण का निर्मल यश सुन चुका । वास्तव में उनके… Read More


ब्रह्मवैवर्तपुराण – प्रकृतिखण्ड – अध्याय 34 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ चौंतीसवाँ अध्याय भगवान् श्रीकृष्ण के स्वरूप, महत्त्व और गुणों की अनिर्वचनीयता सावित्री ने कहा — देव! अब आप मुझे सारभूत एवं परम दुर्लभ हरिभक्ति का उपदेश दीजिये । अन्य सब बातें मैंने आपसे सुन ली हैं । इस समय… Read More


ब्रह्मवैवर्तपुराण – प्रकृतिखण्ड – अध्याय 33 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ तैंतीसवाँ अध्याय छियासी प्रकार के नरक-कुण्डों का विशद परिचय धर्मराज बोले — सतीशिरोमणे! सभी नरककुण्ड पूर्ण चन्द्रमण्डल की भाँति गोलाकार हैं । वे गहरे भी बहुत हैं । उनमें अनेक प्रकार के पत्थर जड़े गये हैं । प्रलयकाल तक… Read More


ब्रह्मवैवर्तपुराण – प्रकृतिखण्ड – अध्याय 32 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ बत्तीसवाँ अध्याय पञ्चदेवोपासकों के नरक में न जाने का कथन सावित्री ने कहा — महाभाग धर्मराज ! आप वेद एवं वेदाङ्ग के पारगामी विद्वान् हैं। जो सबका सारभूत, अभीष्ट, सर्व-सम्मत, कर्म का उच्छेद करने में कारणभूत, परम श्रेष्ठ, मनुष्यों… Read More


ब्रह्मवैवर्तपुराण – प्रकृतिखण्ड – अध्याय 31 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ इकतीसवाँ अध्याय नरक-कुण्डों और उनमें जाने वाले पापियों तथा पापों का वर्णन यम बोले — साध्वि ! जो द्विज पुंश्चली और वेश्या का अन्न खाता तथा उसके साथ गमन करता है, वह मरने के पश्चात् कालसूत्र नामक नरक में… Read More