श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय ३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तीसरा अध्याय हिरण्यकशिपु की तपस्या और वरप्राप्ति नारदजी ने कहा — युधिष्ठिर ! अब हिरण्यकशिपु ने यह विचार किया कि ‘मैं अजेय, अजर, अमर और संसार का एकछत्र सम्राट् बन जाऊँ, जिससे कोई मेरे सामने खड़ा तक न… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय २ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दूसरा अध्याय हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना नारदजी ने कहा — युधिष्ठिर ! जब भगवान् ने वराहावतार धारण करके हिरण्याक्ष को मार डाला, तब भाई के इस प्रकार मारे जाने… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय १ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पहला अध्याय नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा राजा परीक्षित् ने पूछा — भगवन् ! भगवान् तो स्वभाव से ही भेदभाव से रहित हैं — सम हैं, समस्त प्राणियों के प्रिय और सुहृद हैं; फिर उन्होंने, जैसे कोई साधारण… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १९ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय उन्नीसवाँ अध्याय पुंसवन-व्रत की विधि राजा परीक्षित् ने पूछा — भगवन् ! आपने अभी-अभी पुंसवन-व्रत का वर्णन किया है और कहा है कि उससे भगवान् विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं । सो अब मैं उसकी विधि जानना चाहता… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय अठारहवाँ अध्याय अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! सविता की पत्नी पृश्नि के गर्भ से आठ सन्तानें हुई — सावित्री, व्याहृति, त्रयी, अग्निहोत्र, पशु, सोम, चातुर्मास्य… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १७ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सत्रहवाँ अध्याय चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! विद्याधर चित्रकेतु, जिस दिशा में भगवान् सङ्कर्षण अन्तर्धान हुए थे, उसे नमस्कार करके आकाशमार्ग से स्वच्छन्द विचरने लगे ॥ १ ॥ महायोगी चित्रकेतु करोड़ों वर्षों… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १६ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सोलहवाँ अध्याय चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! तदनन्तर देवर्षि नारद ने मृत राजकुमार के जीवात्मा को शोकाकुल स्वजनों के सामने प्रत्यक्ष बुलाकर कहा ॥ १ ॥ देवर्षि नारद ने कहा… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पंद्रहवाँ अध्याय चित्रकेतु को अङ्गिरा और नारदजी का उपदेश श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! राजा चित्रकेतु शोकग्रस्त होकर मुर्दे के समान अपने मृत पुत्र के पास ही पड़े हुए थे । अब महर्षि अङ्गिरा और देवर्षि नारद… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १४ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चौदहवाँ अध्याय वृत्रासुर का पूर्वचरित्र राजा परीक्षित् ने कहा — भगवन् ! वृत्रासुर का स्वभाव तो बड़ा रजोगुण-तमोगुणी था । वह देवताओं को कष्ट पहुँचाकर पाप भी करता ही था । ऐसी स्थिति में भगवान् नारायण के चरणों… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय १३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तेरहवाँ अध्याय इन्द्र पर ब्रह्महत्या का आक्रमण श्रीशुकदेवजी कहते हैं — महादानी परीक्षित् ! वृत्रासुर की मृत्यु से इन्द्र के अतिरिक्त तीनों लोक और लोकपाल तत्क्षण परम प्रसन्न हो गये । उनका भय, उनकी चिन्ता जाती रही ॥… Read More