भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ९ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (मध्यमपर्व — द्वितीय भाग) अध्याय ९ गोत्र-प्रवर आदि के ज्ञान की आवश्यकता सूतजी कहते हैं — ब्राह्मणों ! गोत्र-प्रवर की परम्परा को जानना अत्यन्त आवश्यक होता है, इसलिये अपने-अपने गोत्र या प्रवर को पिता, आचार्य तथा शास्त्र द्वारा… Read More


भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ७ से ८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (मध्यमपर्व — द्वितीय भाग) अध्याय ७ से ८ काल-विभाग, तिथि-निर्णय एवं वर्षभर के विशेष पर्वो तथा तिथियों के पुण्यप्रद कृत्य सूतजी बोले — ब्राह्मणों ! देव-कर्म या पैतृक-कर्म काल के आधार पर ही सम्पन्न होते हैं… Read More


भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ६ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (मध्यमपर्व — द्वितीय भाग) अध्याय ६ चतुर्विध मास-व्यवस्था एवं मलमास-वर्णन सूतजी बोले — ब्राह्मणों ! अब मैं (विभिन्न प्रकार के) मासों का वर्णन करता हूँ । मास चार प्रकार के होते हैं – चान्द्र, सौर, सावन तथा नाक्षत्र… Read More


भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ३ से ५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (मध्यमपर्व — द्वितीय भाग) अध्याय ३ से ५ यज्ञादि कर्म में दक्षिणाका माहात्म्य, विभिन्न कर्मों में पारिश्रमिक व्यवस्था और कलश-स्थापन का वर्णन सूतजी बोले — ब्राह्मणों ! शास्त्रविहित यज्ञादि कार्य दक्षिणा-रहित एवं परिमाण-विहीन कभी नहीं करना… Read More


भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १ से २ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (मध्यमपर्व — द्वितीय भाग) अध्याय १ से २ यज्ञादि कर्मों के मण्डल-निर्माण का विधान तथा क्रौञ्चादि पक्षियों के दर्शन का फल सूतजी ने कहा — ब्राह्मणगण ! अब मैं आप लोगों से पुराणों में वर्णित मण्डल-निर्माण… Read More


॥ रुद्रसूक्त ( नीलसूक्त) ॥ भूतभावन भगवान् सदाशिव की प्रसन्नता के लिये रुद्रसूक्त पाठ का विशेष महत्त्व बताया गया है । पूजा में भगवान शंकर को सबसे प्रिय जलधारा है । इसलिये भगवान् शिव के पूजन में रुद्राभिषेक की परम्परा है और अभिषेक में इस ‘रुद्रसूक्त’ की ही प्रमुखता है । रुद्राभिषेक के अन्तर्गत रुद्राष्टाध्यायी… Read More


॥ वैदिक गणेश-स्तवन ॥ गणानां त्वा गणपतिᳬ हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधिपतिᳬ हवामहे वसो मम । आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥ (शु०यजु० २३ । १९) हे परमदेव गणेशजी ! समस्त गणों के अधिपति एवं प्रिय पदार्थों-प्राणियों के पालक और समस्त सुख-निधियों के निधिपति ! आपका हम आवाहन करते हैं । आप सृष्टि… Read More


॥ ब्रह्मणस्पतिसूक्त ॥ वैदिक देवता विघ्नेश गणपति ‘ब्रह्मणस्पति’ भी कहलाते हैं। ‘ब्रह्मणस्पति के रूप में वे ही सर्वज्ञाननिधि तथा समस्त वाङ्मयके अधिष्ठाता हैं । आचार्य सायण से भी प्राचीन वेदभाष्यकार श्रीस्कन्दस्वामी (वि०सं० ६८७) अपने ऋग्वेदभाष्य के प्रारम्भ में लिखते हैं — “विघ्नेश विधिमार्तण्ड़चन्द्रेन्द्रोपेन्द्रवन्दित । नमो गणपते तुभ्यं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पते ॥” अर्थात् ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र… Read More


भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (मध्यमपर्व — प्रथम भाग) अध्याय – १९ से २१ यज्ञ-पात्रों का स्वरूप और पूर्णाहुति की विधि सूतजी बोले — ब्राह्मणों ! यज्ञ-क्रिया के उपयोग में आनेवाली स्रुवा के निर्माण में — श्रीपर्णी, शिंशपा, क्षीरी (दूधवाले वृक्ष)… Read More


भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १७ से १८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (मध्यमपर्व — प्रथम भाग) अध्याय – १७ से १८ विविध कर्मों में अग्निके नाम तथा होम-द्रव्यों का वर्णन सूतजी बोले — ब्राह्मणों ! अब मैं शास्त्रसम्मत-विधि के अनुसार किये गये विविध यज्ञों में अग्नि के नामों… Read More