भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ३
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ३
नारदजी को विष्णु-माया का दर्शन

राजा युधिष्ठिर ने पूछा — भगवन ! यह विष्णु-भगवान की माया किस प्रकार की है ? जो इस चराचर-जगत को व्यामोहित करती है ।

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — महाराज ! किसी समय नारदमुनि श्वेतद्वीप में नारायण का दर्शन करने के लिये गये । वहां श्रीनारायण का दर्शन कर और उन्हें प्रसन्न-मुद्रा में देखकर उनसे जिज्ञासा की । भगवन ! आपकी माया कैसी है ? कहाँ रहती है ? कृपाकर उसका रूप मुझे दिखायें ।
om, ॐ
भगवान् ने हँसकर कहा — नारद ! माया को देखकर क्या करोगे ? इसके अतिरिक्त जो कुछ चाहते हो वह माँगो ।

नारदजी ने कहा — भगवन ! आप अपनी माया को ही दिखाये, अन्य किसी वर की अभिलाषा नहीं है । नारदजी ने बार-बार आग्रह किया ।नारायण ने कहा – अच्छा, आप हमारी माया देखें । यह कहकर नारद की अँगुली पकड़कर श्वेतद्वीप से चले । मार्ग में आकर भगवान् ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर लिया । शिखा, यज्ञोपवीत, कमण्डलु, मृगचर्म को धारण कर कुशा की पवित्री हाथों में पहनकर वेद-पाठ करने लगे और अपना नाम उन्होंने यज्ञशर्मा रख लिया । इस प्रकार का रूप धारणकर नारद के साथ जम्बूद्वीप में आये । वे दोनों वेत्रवती नदी के तट पर स्थित विदिशा नामक नगरी में गये । उस विदिशा नगरी में धन-धान्य समृद्ध उद्यमी, गाय, भैंस, बकरी आदि पशु-पालन में तत्पर, कृषिकार्य को भलीभाँति करनेवाला सीरभद्र नामका एक वैश्य निवास करता था । वे दोनों सर्वप्रथम उसीके घर गये । उसने इन विशुद्ध बाह्मणों का आसन, अर्घ्य आदि से आदर-सत्कार किया । फिर पूछा – ‘यदि आप उचित समझें तो अपनी रूचि के अनुसार मेरे यहाँ अन्नका भोजन करें ।’ यह सुनकर वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी भगवान् ने हँसकर कहा — ‘तुमको अनेक पुत्र-पौत्र हों और सभी व्यापार एवं खेतीमें तत्पर रहें । तुम्हारी खेती और पशु-धन की नित्य वृद्धि हो’ – यह मेरा आशीर्वाद हैं । इतना कहकर वे दोनों वहाँ से आगे गये । मार्ग में गंगा के तट पर वेणिका नाम के गाँव में गोस्वामी नाम का एक दरिद्र ब्राह्मण रहता था, वे दोनों उसके पास पहुँचे । वह अपनी खेती की चिन्ता में लगा था । भगवान् ने उससे कहा — ‘हम बहुत दूरसे आये हैं, अब हम तुम्हारे अतिथि हैं, हम भूखे हैं, हमें भोजन कराओ ।’ उन दोनों को साथ में लेकर वह ब्राह्मण अपने घर पर आया । उसने दोनों को स्नान-भोजन आदि कराया, अनन्तर सुखपूर्वक उत्तम शय्या पर शयन आदि की व्यवस्था की । प्रातः उठकर भगवान् ने ब्राह्मण से कहा — ‘हम तुम्हारे घर में सुखपूर्वक रहे, अब जा रहे हैं । परमेश्वर करे कि तुम्हारी खेती निष्फल हो, तुम्हारी सन्तति की वृद्धि न हो’ – इतना कहकर वे वहाँ से चले गये ।

मार्ग में नारदजी ने पूछा — भगवन ! वैश्य ने आपकी कुछ भी सेवा नहीं की, किन्तु उसको आपने उत्तम वर दिया । इस ब्राह्मण ने श्रद्धा से आप की बहुत सेवा की, किन्तु उसको आपने आशीर्वाद के रुप मे शाप ही दिया – ऐसा आपने क्यों किया ?

भगवान ने कहा – नारद ! वर्षभर मछली पकड़ने से जितना पाप होता हैं, उतना ही एक दिन हल जोतने से होता हैं । वह सीरभद्र वैश्य अपने पुत्र-पौत्रों के साथ इसी कृषि-कार्य में लगा हुआ है, वह नरक में जायगा, अतः हमने न तो उसके घर में विश्राम किया और न भोजन ही किया । इस ब्राह्मण के घर में भोजन और विश्राम किया । इस ब्राह्मण को ऐसा आशीर्वाद दिया है कि जिससे यह जगज्जाल में न फँसकर मुक्ति को प्राप्त करे ।

इस प्रकार मार्ग में बातचीत करते हुए वे दोनों कान्यकुब्ज देश के समीप पहुँचे । वहाँ उन्होंने एक अतिशय रम्य सरोवर देखा । उस सरोवर की शोभा देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए ।

भगवान् ने कहा — नारद ! यह उत्तम तीर्थस्थान है । इसमें स्नान करना चाहिये, फिर कन्नौज नाम के नगर में चलेंगे इतना कहकर भगवान् उस सरोवर में स्नान कर शीघ्र ही बाहर आ गये ।

तदनंतर नारदजी भी स्नान करने के लिये सरोवर में प्रविष्ट हुए । स्नान सम्पन्न कर जब वे बाहर निकले, तब उन्होंने अपने को दिव्य कन्या के रूप में देखा । उस कन्या के विशाल नेत्र थे । चन्द्रमा के समान मुख था, वह सर्वांग-सुन्दरी कन्या दिव्य शुभलक्षणों से सम्पन्न थी । अपनी सुन्दरता से संसार को व्यामोहित कर रही थी । जिस प्रकार समुद्र से सम्पूर्ण रूप की निधान लक्ष्मी निकली थीं, उसीप्रकार सरोवर से स्नान के बाद नारदजी स्त्री के रूप में निकले । भगवान् अन्तर्धान हो गये । वह स्त्री भी अपने झुण्ड से भ्रष्ट अकेली हरिणी की तरह भयभीत होकर इधर-उधर देखने लगी । इसी समय अपनी सेनाओं के साथ राजा तालध्वज वहाँ आया और उस सुन्दरी को देखकर सोचने लगा कि यह कोई देवस्त्री हैं या अप्सरा ? फिर बोला – ‘बाले ! तुम कौन हो, कहाँ से आयी हो ?’ उस कन्या ने कहा – ‘मैं माता-पिता से रहित और निराश्रय हूँ । मेरा विवाह भी नहीं हुआ है, अब आपकी ही शरण में हूँ ।’ इतना सुनते ही प्रसन्नचित्त हो राजा उसे घोड़े पर बैठाकर राजधानी पहुँचा और विधिपूर्वक उससे विवाह कर लिया । तेरहवें वर्ष में वह गर्भवती हुई । समय पूर्ण होने पर उससे एक तुंबी (लौकी) उत्पन्न हुई, जिसमें पचास छोटे-छोटे दिव्य शरीर वाले युद्ध में कुशल बलशाली बालक थे, उसने उनको घृतकुण्ड में छोड़ दिया, कुछ दिन बाद पुत्र और पौत्रों की खूब वृद्धि हो गयी । वे महान अहंकारी, परस्पर-विरोधी और राज्य की कामना करनेवाले थे । अनन्तर राज्य के लोभ से कौरव और पाण्डवों की तरह परस्पर युद्ध करके समुद्र की लहरों की भाँती लड़ते हुए वे सभी नष्ट हो गये । वह स्त्री अपने वंश का इस प्रकार संहार देखकर छाती पीटकर करूणापूर्वक विलाप करती हुई मुर्च्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ी । राजा भी शोक से पीड़ित हो रोने लगा ।

इसी समय ब्राह्मण का रूप धारणकर भगवान् विष्णु द्विजों के साथ वहाँ आये और राजा तथा रानी को उपदेश देने लगे — ‘यह विष्णु की माया है । तुमलोग व्यर्थ ही रो रहे हो । सम्पूर्ण प्राणियों की अन्त में यही स्थिति होती है । विष्णुमाया ही ऐसी है कि उसके द्वारा सैकड़ों चक्रवर्ती और हजारों इन्द्र उसी तरह नष्ट कर दिये गये हैं जैसे दीपक को प्रचन्ड वायु विनष्ट कर देती है । समुद्र को सुखाने के लिये भूमि को पीसकर चूर्ण कर डालने की तथा पर्वत को पीठ पर उठाने की सामर्थ्य रखनेवाले पुरुष भी काल के कराल मुख में चले गये हैं । त्रिकुट पर्वत जिसका दुर्ग था, समुद्र जिसकी खाई थी, ऐसी लंका जिसकी राजधानी थी, राक्षसगण जिसके योद्धा थे, सभी शास्त्रों और वेदों को जाननेवाले शुक्राचार्य जिसके लिये मंत्रणा करते थे, कुबेर के धनको भी जिसने जीत लिया था, ऐसा रावण भी दैववश नष्ट हो गया । युद्धमें, घरमें, पर्वतपर, अग्निमें, गुफामें अथवा समुद्रसे कहीं भी कोई जाय, वह काल के कोप से नहीं बच सकता । भावी होकर ही रहती है । पाताल में जाय, इन्द्रलोक में जाय, मेरु पर्वतपर चढ़ जाय, मन्त्र, औषध, शस्त्र आदिसे भी कितनी भी अपनी रक्षा करे, किन्तु जो होना होता हैं, वह होता ही है – इससे किसी प्रकार का संदेह नहीं हैं । मनुष्यों के भाग्यानुसार जो भी शुभ और अशुभ होना है, वह अवश्य ही होता है । हजारों उपाय करनेपर भी भावी किसी भी प्रकार नहीं टल सकती । कोई शोक-विह्वल होकर आँसू टपकता हैं, कोई रोता हैं, कोई बड़ी प्रसन्नता से नाचता हैं, कोई मनोहर गीत गाता हैं, कोई धनके लिए अनेक उपाय करता हैं, इस तरह अनेक प्रकार के जाल की रचना करता रहता हैं, अतः यह संसार एक नाटक है और सभी प्राणिवर्ग उस नाटक के पात्र हैं ।’

इतना उपदेश देकर भगवान् ने रानी का हाथ पकड़कर कहा — ‘नारदजी ! तुमने विष्णु की माया देख ली । उठो ! अब स्नान कर अपने पुत्र-पौत्रों को अर्घ्य देकर और्ध्वदैहिक कृत्य करो । यह माया विष्णु ने स्वयं निर्मित की है ।’ इतना कहकर उसी पुण्यतीर्थ में नारद को स्नान कराया । स्नान करते ही स्त्री-रूप को छोडकर नारदमुनि ने अपना रूप धारण कर लिया । राजाने भी अपने मंत्री और पुरोहितों के साथ देखा कि जटाधारी, यज्ञोपवीतधारी, दण्ड-कमण्डलु लिये, वीणाधारण किये हुए, खड़ाऊँ के ऊपर स्थित एक तेजस्वी मुनि हैं, यह मेरी रानी नहीं है । उसी समय भगवान् नारद का हाथ पकड़कर आकाश-मार्ग से क्षणमात्र में श्वेतद्वीप आ गये ।

भगवान् ने नारद से कहा – देवर्षि नारदजी ! आपने मेरी माया देख ली । नारद के देखते-देखते ऐसा कहकर भगवान विष्णु अन्तर्हित हो गये । देवर्षि नारदजी ने भी हँसकर उन्हें प्रणाम किया और भगवान् की आज्ञा प्राप्त कर तीनों लोकों में घुमने लगे । महाराज ! इस विष्णुमाया का हमने संक्षेप में वर्णन किया । इस माया के प्रभाव से संसार के जीव, पुत्र, स्त्री, धन आदि में आसक्त हो रोते-गाते हुए अनेक प्रकार की चेष्टाएँ करते हैं ।
(अध्याय ३)

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